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चरित्र ही इस जीवन में सबकुछ है

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एक पुरूष और महिला का चरित्र कैसे निर्धारित होता है ?   स्वामी विवेकानंद अमेरिका के एक बाजार से गुजर रहे थे। उन्होंने साधुओं की वेशभूषा धारण कर रखी थी। वहां के लोगों के लिए यह विचित्र वेषभूषा थी। उन्हें देख एक अमेरिकन महिला ने अपने पति से पूछा, 'क्या यह सभ्य पुरुष हैं।' उसके पति ने तो इसका कोई उत्तर नहीं दिया, लेकिन स्वामी जी बोले, 'अमेरिका में एक दर्जी सुंदर वेषभूषा सिल कर किसी को भी सभ्य पुरुष बना देता है, परंतु भारत में चरित्र ही किसी को सभ्य पुरुष बनाता है।' स्वामी जी ने जीवन में चरित्र की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा था- 'इच्छाशक्ति का सतत अभ्यास करते जाओ, यह तुम्हें ऊंचा उठाएगी। यह इच्छाशक्ति सर्वशक्तिमान है। हर तरह की कठिनाई को पार करके आगे बढ़ने की शक्ति हमें अपने चरित्र से ही मिलती है।' मनुष्य का चरित्र इससे तय होता है कि किसी कार्य के प्रति उसकी प्रवृत्ति कैसी है। वह जो कुछ बनता है, अपने सोच-विचार से बनता है। अत: जो हम सोचते हैं उसका ध्यान रखें। क्योंकि हम जो प्रत्येक कर्म करते हैं और प्रत्येक विचार जिसका हम चिंतन करते हैं, वे...

ख़ामोश रहने की अच्छी परिस्थितियां

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किन परिस्थितियों में खामोश रहना बेहतर है कि हमें कोई नुकसान न हो? 28/05/2019 काम से ही इंसान की पहचान होती है,और रोजमर्रा में कई अवसर ऐसे भी आते हैं जब व्यक्ति की ज़बान ही उसके ज्ञान,आचार -व्यवहार एवं व्यक्तित्व को दर्शाने का मुख्य माध्यम बन जाती है। लेकिन इसके उलट कई स्थितियां ऐसी भी होती हैं,जब आपकी वाणी सिर-फुटावल की नौबल ला सकती है या किसी बनती बात को बिगाड़ सकती है तो ऐसे स्थितियों पर आपकी चुप्पी ही बेहतर होती हैं: बिना किसी रचनात्मकता उपयोगिता के विषयों पर.. जिनकी विषयों की कोई रचनात्मक उपयोगिता न हो, उन पर मौन ही रहना बेहतर होता है।   उदाहरण के लिये घर व बाहर की छोटी-छोटी बातें,जैसे किसने क्या पहना,क्या बनाया,क्या खाया,देर से आई,जल्दी चली गई वगैरह,   वगैरह। इस तरह की टीका-टिप्पणी व्यर्थ होती हैं और इस पर बहस की जाए तो यह मूर्खता ही होगी। पूरी जानकारी अथवा ठोस प्रमाण न हो तो.. जब तक किसी विषय की पूरी जानकारी व ठोस प्रमाण न हो,अपने आप को चुप रखना ही बेहतर होता है।ऐसे में बहस करने से आपकी छवि ही धूमिल होगी। इसके अलावा बहस के दौरान विपक्...