चरित्र ही इस जीवन में सबकुछ है
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
स्वामी विवेकानंद अमेरिका के एक बाजार से गुजर रहे थे। उन्होंने साधुओं की वेशभूषा धारण कर रखी थी। वहां के लोगों के लिए यह विचित्र वेषभूषा थी। उन्हें देख एक अमेरिकन महिला ने अपने पति से पूछा, 'क्या यह सभ्य पुरुष हैं।' उसके पति ने तो इसका कोई उत्तर नहीं दिया, लेकिन स्वामी जी बोले, 'अमेरिका में एक दर्जी सुंदर वेषभूषा सिल कर किसी को भी सभ्य पुरुष बना देता है, परंतु भारत में चरित्र ही किसी को सभ्य पुरुष बनाता है।' स्वामी जी ने जीवन में चरित्र की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा था- 'इच्छाशक्ति का सतत अभ्यास करते जाओ, यह तुम्हें ऊंचा उठाएगी। यह इच्छाशक्ति सर्वशक्तिमान है। हर तरह की कठिनाई को पार करके आगे बढ़ने की शक्ति हमें अपने चरित्र से ही मिलती है।' मनुष्य का चरित्र इससे तय होता है कि किसी कार्य के प्रति उसकी प्रवृत्ति कैसी है। वह जो कुछ बनता है, अपने सोच-विचार से बनता है। अत: जो हम सोचते हैं उसका ध्यान रखें। क्योंकि हम जो प्रत्येक कर्म करते हैं और प्रत्येक विचार जिसका हम चिंतन करते हैं, वे सब चित्त पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं। प्रत्येक मनुष्य का चरित्र इन सारे प्रभावों के आधार पर तय होता है।
यदि प्रभाव अच्छे हों तो चरित्र अच्छा होता है और यदि ये प्रभाव खराब हों, तो चरित्र बुरा होता है। चरित्र निर्माण की इस प्रक्रिया से जहां यह निर्धारित होता है कि कोई व्यक्ति आगे चलकर कैसा बनेगा, वहीं यह भी तय होता है कि इससे भावी समाज और संसार का निर्माण कैसा होगा। आज अगर हम अपने आसपास भ्रष्टाचार, दुराचार और ऐसी ही समस्याओं की अधिकता देख रहे हैं, तो इन समस्याओं का मूल कारण चरित्र निर्माण के महान कार्य की लगातार उपेक्षा किया जाना है। क्षणिक सुखों और छोटे स्वार्थों की दौड़ में लोग जीवन के इस सबसे महत्वपूर्ण कार्य यानी चरित्र निर्माण को भुला बैठे हैं। यही वजह है कि ऊपरी तौर पर विकास के नए-नए रेकॉर्ड बनाने के बावजूद हमारा समाज नैतिक मूल्यों के पतन की समस्या से बुरी तरह जूझ रहा है। इसका परिणाम गंभीर मनोरोगों से लेकर कलह, अशांति और गहन विषाद के रूप में निकल रहा है। चरित्र निर्माण के अभाव में इन समस्याओं का कोई उचित समाधान भी नहीं निकल पा रहा है।
इसलिए आज सबसे जरूरी यह है कि लोग चरित्र निर्माण को अपनी प्राथमिकता पर लें। अगर हम यह नहीं करेंगे तो हमारी समस्याएं बढ़ती ही जाएंगी। चरित्र मनुष्य की ऐसी संपदा है जो बड़े से बड़े लालच में भी व्यक्ति को अपने कर्तव्य पथ से डिगने नहीं देती। कोई भी व्यक्ति सत्कमोंर् और अच्छे विचारों से अपने चरित्र का निर्माण कर सकता है। पर खुद को चरित्रवान बनाए रखने के लिए जरूरी है कि उसे हमेशा बनाए रखने के लिए प्रयत्न किए जाएं।
जिस तरह जीवित रहने के लिए सांस चाहिए और पोषण के लिए शरीर को भोजन-पानी की जरूरत होती है, उसी तरह चरित्र बनाए रखने के लिए भी उसे अच्छे विचारों के खाद-पानी की जरूरत होती है। यह खाद-पानी खुद को अनुशासित रखने से मिलती है। संत तिरुवल्लुवर के शब्दों में 'आत्मानुशासन जीवन से भी अधिक कीमती है, क्योंकि उसी से मनुष्य जीवन मूल्य प्राप्त करता है।' अनुशासन के अभाव में जब हम उच्च आदशोर्ं और नैतिक मूल्यों से तालमेल नहीं बिठा पाते हैं, तो भीतर से टूट जाते हैं। व्यक्ति जब अंदर से टूटता है तो वह बाहरी समाज से भी समायोजन करने में नाकाम हो जाता है। चरित्र निर्माण में अच्छे विचारों और चिंतन से ज्यादा महत्व श्रेष्ठ आचरण का है। हमारे विचार, कर्म, व्यवहार, चरित्र और लक्ष्य प्राप्ति सभी कुछ एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही पाते हैं। एक विचारक ने इस बारे में बहुत सटीक टिप्पणी की है। उनके अनुसार- विचार का बीज बोओ, कर्म की खेती काटो। कर्म का बीज बोओ, व्यवहार की फसल पाओ। व्यवहार का बीज बोओ, चरित्र (कीर्ति) का फल पाओ। चरित्र का बीज बोओ, भाग्य की फसल काटो
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें